संदेश

आवाज बंद

कोई भी ताकतवर अपनी ताकत   का प्रदर्शन कमज़ोर पर ही आजमा कर करता है ... कमज़ोर अपनी बात कह न सके इसके लिए सबसे पहले उसकी जुबां छिनी जाती है.... और यही आवाज़ छीनने की कोशिश की जा रही   उन समुदाय से जिनके लिए आज सामुदायिक रेडियो ही सब कुछ है.. मनोरंजन से लेकर हर बात की जानक ा री उन्हें अपने रेडियो के ज़रिये मिलती है , उनकी आवाज़ है सामुदायिक रेडियो... दूर संचार विभाग द्वारा रेडियो से एक सालाना स्पेक्ट्रंम फीस ली जाती है , ताकि रेडियो स्टेशन को एक फ्रीक्वंसी दी जा सके , हर रेडियो स्टेशन का प्रसारण इस फ्रीक्वंसी पर होता है , जिस पर तरंग ध्वनियों   को आकाश में छोड़ा जाता है. जिसे स्पेक्ट्रंम   कहते हैं और सरकार इस पर शुल्क लेती है ।   इसी शुल्क को एक गुना नहीं बल्कि पांच गुना ज्यादा करने जा रही है... पहले जहाँ ये सालाना 19,700 था वहीँ ये 91 , ००० हो गया है.. जो की सामुदायिक रेडियो के बूते से सामर्थ्य से ब ा हार की चीज़ें हैं....   सूचना प्रसारण मंत्रालय विभाग और दूर संचार विभाग the Ministry of Information and Broadcasting (MoIB) along with Min...

खेल के नाम पर खिलवाड़

राष्ट्रमंडल खेल पूरी दुनिया के लिए खेल महोत्सव है। मगर यह कम ही लोगों को मालूम हो कि इसने कितने लोगों के जीवन के साथ खिलवाड किया।यह खेल है....मगर किसी के सपनों के साथ खेल....तो किसी के भविष्य के साथ खेल .....और कितनों के अस्तित्व के साथ खिलवाड हो गया। दिल्ली में हो रही इस राष्ट्रमंडल खेल में शूटिंग प्रतियिता का आयोजन गुडगाँव में किया जा रहा है.....इसके लिए गुडगाँव पुलिस ने सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पूरे गुडगाँव में वेरीफिकेशन की प्रक्रिया अपनाई...जिसके तहत सभी को अपने निकटतम पुलिस स्टेशन में अपना कोई भी पहचान पत्र जमा करवाना था। भई अच्छी बात है....इसी बहाने सभी का वेरीफिकेशन भी हो रहा है। बात यदि इतने पर खत्म हो जाती तो फिर वह बात ही क्या जो राष्ट्रमंडल खेल से जुडे और विवादित न हो। गुड़गाँव..जो विश्व पटल पर मिलेनियम सिटी..साइबर सिटी के नाम से जाना जाता है और यहाँ रह रहे प्रवासियों के लिए तो यह सपनो के शहर से कम नहीं।इस औद्योगिक नगरी में बहुत से प्रवासी मित्र काम की तलाश में आते है और अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश करते है।ये सभी बिहार,उडीसा,उत्तरप्रदेश,पं.बंगाल से आए हैं। सभी का...

गुडगाँव की आवाज़ की सफर में...........

नवीं क्लास के बाद नरेश का दिल पढने में नहीं लगा,उसने आगे की पढाई नहीं की और घर में भी उसे किसी ने पढ़ने के लिए दबाव नहीं डाला ।दिन तो बीतते जा रहे थे।मगर नरेश के जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आया,सिवाय स्कूल न जाने के। गुड़गाँव स्टेशन के पास सरायगाँव—यही है नरेश का गाँव ,सिर्फ अपने गाँव तक ही उसकी दुनिया थी।लगभग एक साल पहले तक नरेश की यही स्थिति थी।उसे बस उसके दोस्त जानते थे।और कुछ वे लोग जो इसलिए जानते थे...क्योंकि वह दिन भर गाँव में हाणता (घूमता) रहता था।मगर आज उसी नरेश को पूरा गाँव जानता है.....वह अब गुड़गाँव की आवाज सामुदायिक रेडियो में रिपोर्टर है। गाँव में जब लोग उसके उसके कार्यक्रम को सुनते हैं तो उसकी माँ के पास शब्द नहीं होते.....इस खुशी को बयां करने। नरेश की आंखें भी चमक उठती हैं...नरेश एडिटिंग में सबसे माहिर है।पूरे कार्यक्रम के तैयार होने के बाद प्रसारण से पहले जब नरेश को वह कार्यक्रम सुनाती हूँ....तो वह बारीकी से गलती निकाल लेता है। उसकी सबसे अच्छी खूबी यह है कि उसे पता होता है कि बीस मिनट की रिकॉर्डिंग में उसे क्या उड़ा देना है।उड़ा देने के बाद आपके प...

आज कौन सा डे है

मैं कुछ लिखकर उठी थी । दिमाग की सारी ऊर्जा लिखने में डाल दी थी.इसलिए उसने काम करना बंद कर दिया था।डेट और डे मुझे लिखना था,वो ध्यान में नहीं आ रहा था।मैंने जोर से सार्वजनिक तौर पर पूछा-आज कौन सा –डे है ?तभी बरामदे में कैरम में मशगूल मेरा ग्यारह वर्षीय भांजे ने तपाक से उत्तर दिया –रोज़ डे । मैंने आश्चर्य से पूछा- क्या??? ,उसने बडे भोलेपन से कहा –हाँ और लेख की पहली लाइन सुना दी। 7 फरवरी को रोज़ डे मनाया जाता है।मैंने उससे पूछा कि –तुम्हें कैसे मालूम,इससे पहले कि वह जवाब दे-उनके छोटे मियां ने और महत्वपूर्ण जानकारियाँ दे दी-मासी, 8 फरवरी को प्रोपोज डे और 9 फरवरी को चॉकलेट डे मनाया जाता है । मैं कुछ समझ पाती या कह पाती कि बडे मियां ने पूरे विश्वास के साथ अपने आई.क्यू के पुख्ता होने का सबूत दिया कि 10 फरवरी को टैडी डे और 12 फरवरी को किस डे है।मुझे तो ऐसा लग रहा था कि क्लास में मोस्ट टैलेंटेड बच्चों के सामने टीचर मेरी खाल उधेड रही हैं। उनका आत्मविश्वास और अचरज भरी मुस्कान देखकर यह अंदाजा सहज लगाया जा सकता था कि वे यही सोच रहे होंगे कि -हे भगवान! मासी को इतना भी नहीं पता ।अंत में दोनो...

और कितने सत्यम

मनुष्य यदि अपनी गलती स्वीकार कर ले तो वह माफी का हकदार हो सकता है। लेकिन यदि उस गलती का खामियाजा एक बडे जनसमुदाय को भुगतना पडे,तब माफी का दायरा भी संकुचित हो सकता है। देश की चौथे नंबर बडी आई टी कंपनियों में से एक सत्यम को, उससे जुडे आई टी प्रोफशेनल्स और शेयरधारक इस फर्जीवाडे खुलासे के बाद शायद ही कभी माफ करे। सत्यम के संस्थापक –चेयरमैन बी.रामालिंगा राजू ने अपनी गलती स्वीकार की है कि पिछले दस सालों से कंपनी के बही खातों में हेरा फेरी किया जा रहा है। आवश्यकता से अधिक मुनाफा और आमदनी कंपनी के बैलेंसशीट में दिखाए गए हैं। सत्यम पिछले कुछ हफ्तों से कर्ज में डूबा हुआ है । अपने दो पुत्र तेजा राजू और रामा बी.राजू की दो कपनियाँ मायटास इन्फ्रास्ट्रक्चर और मायटास प्रापर्टीज को अधिग्रहित करने का फैसला किया उसके बाद से ही सत्यम अपने शेयरधारकों का कोपभाजन का शिकार बनी हुआ है। इस हेरा फेरी में किसी का ध्यान भी नहीं गया क्योंकि यह भी उस दौर में हुआ जब शेयर बाजार आसमान छू रही थी। और अर्थव्यवस्था के साथ साथ कारपोरेट क्षेत्र बूम कर रहा था । लेकिन इस प्रकरण के बाद अब देश...

ज्ञान और अनुभव को कैसे अलग....

ज्ञान और अनुभव को कैसे अलग किया जा सकता है। आप ने बड़े ही फुर्सत में लिखा है कि आपको ज्ञान बघारना नहीं आता है॥आखिर इस ज्ञान को कैसे परिभाषित किया जाए ॥जिसे हम ज्ञान कह कर उपेक्षित ठहरा रहे हैं दरअसल वह भी अनुभवों के आधार पर विकसित हुआ है। इसलिए जिस अनुभव को आप उपयोगी बता रही हैं वह किसी चीज को समझने की क्षमता यानी ज्ञान का पूर्ववर्ती स्वरूप है। किसी का अनुभव दूसरे के लिए ज्ञान बन जाता है। जैसे चाकू की धार को जांचते हुए उंगली काटने का अनुभव अगली पीढ़ी के लिए ज्ञान बन जाता है। जरूरी नहीं कि अगली पीढ़ी हाथ काटने के अनुभव से ही गुजरे।

क्या राहुल वाकई मर गया

राहुल की उम्र देश के युवाओं का प्रतिनिधित्व करती है। जिस तरह से हमने गड़बड़ियां पैदा की हैं...उसका नमूना है राहुल का राज ठाकरे से बात करने की जिद ...जबकि वह सिर्फ बात करना चाहता था ,फिर भी उसकी आवाज को दबा दिया गया। उससे पुलिस को इतना खतरा क्यों लगा। जबकि उसने न तो किसी को मारा और न ही उससे पास पिस्टल के अलावा कोई हथियार था। अगर उसका उद्देश्य मारना होता तो वह राज ठाकरे से बात करने की जिद क्यों करता । लेकिन भारतीय स्टेट पुलिस की एक और सक्रियता...एक और सफलता.....एक और एन्काउटर.....मारने वाले पुलिस इंस्पेक्टर के प्रोफाइल में एक और एनकाउन्टर की बढ़ोत्तरी.... जिस प्रक्रिया के तहत भारत में विकास को आगे बढाया जा रहा है,उसके आधार पर इसकी सम्भावना तेज हो जाती है कि सैकड़ों राहुल लोकबाग, अदालती कार्यवाहियों और शासकीय सुरक्षा पर विश्वास करने के बजाए खुद ही हथियार उठाने लगें। राजठाकरे को रोकने के लिए सीधे चुनौती देने वाला राहुल यह कतई साबित नहीं करता कि वह आज के हालात में अकेला विद्रोही है। फिलहाल पुलिस ने उसे मार दिया है, लेकिन उसकी मौत ने यह बताने में सफलता हासिल कर ली है,स्थितियों के और बदतर...